Posted by: Vikram | January 7, 2013

क्यो नहीं दिला पाता हमारा लोकतंत्र भारत की बेटियो को इन्साफ ?


(हिंदी मैं गलतियो के लिए माफ़ी चाहता हू )

आज़ादी के संघर्ष में भारत की महिलाओं ने बराबर का योगदान दिया । बहुत सारी महिलओं ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की आजाद हिन्द फ़ौज के ‘झाँसी की रानी’ सेन्य दल में अपनी जान की बाज़ी भी लगा दी। मगर आजाद हिंदुस्तान का सपना यह तो नहीं था, की समाज में लड़कियो पर अत्यचरो के खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए, एक युविका को शहादत देनी पड़े। हमें औरत जाती की बराबरी हमारे लोकतंत्र और हमारे आजाद खयालोँ से कायम करनी थी, राष्ट्रपति निवास के सामने प्रदर्शन करके नहीं। मगर साफ़ हैं की आज हमारे आदिवासिओं के साथ-साथ, हमारी महिलाओं के लिए भी हमारा लोकतंत्र इन्साफ नहीं ला पाया हैं। मगर क्यो ?

भारत के लोकतंत्र ने कई सफलताएं हासिल की हैं। इंडिया के दलितो में सामजिक और आर्थिक परिवर्तन आया हैं। महिलायें भारी संख्या में पढ़े-लिखे और काम-काज करनेवालो में शामिल हुई हैं। एक बहुत विशाल, अत्यंत बहुरंगी मुल्क ने एक आजाद और लोकतांत्रिक राष्ट्र की पहचान पाई हैं। लेकिन कई पैमानो पर हमारा लोकतंत्र असफल भी रहा हैं। आज हमारा राष्ट्र समाज की बुराईयो से लड़ने की बजाएं समाज के खौफ में घुट रहा हैं।

इन असफलताओं के लिए कईं आकास्मिक और संरचनात्मक कारण हैं। भ्रष्ट नेता आकस्मिक कारण में गिने जायेंगे। मगर मैं यहाँ संरचनात्मक कारणो पर विश्लेषण करूंगा ।

हिंदुस्तान के रीती-रिवाज़ और हमारी विजातीय आबादी की वजह से महिलाओं की लैनागिकता (sexuality) पर समाज भारी पाबंदियां लगाता हैं। इंडिया की हर भाषा/धर्म/जाती पर आधारित हर कौम अपनी मर्दानगी के प्रदर्शन की ज़रुरत महसूस करती हैं। और हर कौम की ‘इज्ज़त’ महिलाओं के लैनागिक व्यवहार पर नियंत्रण रखने पर निर्भर करती हैं। सुसाध्य परिवारो में इसका अंजाम यह होता हैं की लड़कियो को अपने मनपसंद लड़के से शादी करने पर माँ-बाप के बहिष्कार का सामना करना पड़ता हैं, लेकिन कड़े परिवारो में ‘ऑनर किलिंग’ तक की जाती हैं। ज़ाहिर सी बात हैं की अगर कौम की ‘इज्ज़त’ स्त्रियो की लैनागिक ‘शुद्धता’ पर निर्भर करेगी, तो बलात्कार और यौन उत्पीडन, ख़ास तौर पर सामूहिक बलात्कार, कमज़ोर कौमो के खिलाफ एक हथ्यार बन जाते हैं। इसी वजह से सामूहिक बलात्कार भारत और पाकिस्तान मैं भारी मात्रा मैं होते हैं।

दूसरा संरचनात्मक कारण भारत के कुछ धार्मिक रिवाज़ हैं। हिंदुस्तान के सबसे बड़े मज़हब, हिन्दू धर्म और इस्लाम, औरतो पर भारी प्रतिबंध लगाते हैं। हिन्दू धर्म को दैवत्व के नारी प्रकार दिखाना का श्रेय तो ज़रूर मिलता हैं, लेकिन यह नारी प्रकार सिर्फ माँ के रूप मैं आती हैं। काली माँ, दुर्गा माँ, माता लक्ष्मी, माता पारवती, सरस्वती माँ … मैंने कभी किसीको शिव या विष्णु को शिव पिता या पिता विष्णु के नाम से सम्भोदित करते हुए नहीं सुना हैं। हिन्दू कथाओं और धर्मग्रंथो में स्वतन्त्र नारियां (जो किसीकी बहन, माँ या पतनी की भूमिका ना कर रही हो) कम देखने को मिलती हैं। जहाँ तक की इस्लाम का सावल हैं, डॉक्टर अम्बेडकर ने कहा हैं,

कोई शक की बात नहीं हैं की भारत के मुस्लिम समाज में वही खराबियां हैं जो हिन्दू समाज में हैं। बलकी, मुसलमानो मैं हिन्दुओं की खराबियां समेत कुछ और भी हैं। वोह हैं परदे की व्यवस्था।
कोई आसानी से देख सकता हैं की अगर महिलाओं को अपनी शकल भी दुनिया को दिखाने की अनुमति नहीं दी जाती हैं, तो और किसी तरह की आज़ादी का सवाल ही नहीं उठता।

तीसरा कारण, जो 1990s से काफी महत्वपूर्ण होगया हैं, वोह हैं मुक्त बाजारीक अर्थ व्यवस्था का दबाव और मीडिया उद्योग। इनकी वजह से औरतो का शरीर deodarant, शैम्पू, कपडे वाघ्येरा बेचने के लिए एक वस्तु बन गया हैं। काम-भावना हर जगह बिकती हैं। इसलिए कोई ताज्जुब की बात नहीं हैं की बॉलीवुड ने अपने नर दर्शको की लैंगिक दमित्ता का फायदा उठाने के लिए, चिकनी चमेली और मुन्नी बदनाम हुई जैसे साधनो का लगातार इस्तेमाल किया हैं। मुन्नी, चमेली और शीला का लोभ करने वाला हर आदमी यह सोचता हैं की यह किस्सी और की बहन या बीवी हैं, लेकिन शायद यह नहीं समझ पाता की बाकी मर्दों के लिए चमेली या शीला उसकी बहन या बेटी हो सकती हैं।

चौथा कारण भारत में लोकतंत्र का विकार और उसका मतलब सिर्फ चुनाविक लड़ाई बन जाना हैं। इस पर मैं काफिला ब्लॉग पर प्राची सिन्हा के लेख से एक वाक्यखण्ड प्रस्तुत करता हू ,

जब नारियो के खिलाफ हिंसा की बातचीत में वर्ग का मुद्दा उठता हैं, तो यह कहाँ जाता हैं की मर्द राज सारे वर्गों में लाबू हैं। लेकिन सच बात तो यह हैं की औरतो के खिलाफ अपराध झुग्गी झोपड़ियो में ज्यादा होते हैं। इस अलग दुनिया की महिलाओं को मध्य वर्ग की महिलाओं से अधिक खतरो का सामना करना पड़ता हैं। दर असल झुग्गियो की पूरी आबादी को इन इलाखो के गुंडो के डर मैं जीना पड़ता हैं, जिनकी  ऐसे अपराधो में शामिल होने की संभावना ज्यादा होती हैं।
मैं दस साल से शहर की झुग्गियो में गारिबो के साथ काम कर रही हु। और मैं यह दावे के साथ कह सकती हू की अगर इन गुंडो को झुग्गियो से हटा दिया जाये, तो गरीबी और गंदगी के बावजूद यह रहने के लिए बेहतर जगाएं बन जाएँगी। पर इन्हें कैसे निकाल सकते हैं ? आज हमारी राजनीतिक व्यवस्था ऐसी बन गयी हैं, की ऐसे गुंडे झुग्गियो मैं राजनितिक दलो की रीड की हड्डी बन चुके हैं। सियासी दलो के लिए यह गुंडे उस व्यवस्था के प्यादे हैं जो सीधे ऊपर तक पहुँचती हैं। हर राजनितिक दल जो सत्ता में आना चाहती हैं, वोह झुग्गियो में ऐसे गुंडो को पालती हैं। राज करनेवाले वर्ग झुग्गियो से तो दूर रहते हैं और इंडिया गेट के संसथान से राज करते हैं, लेकिन ऐसे पेचीदे जालो के द्वारा झुग्गियो से जुड़े होता हैं।

यह जाल हाल ही प्रदर्शित हुई दिबाकर बनेर्जी की फिल्म ‘शंघाई’ में खूबी से दिखाए गया हैं। कोई आश्चर्य की बात नहीं हैं की इस तरह की सियासी व्यवस्था राष्ट्र को हिंदुस्तानी नारियो की सहायता नहीं करने देगी।

अगर भारत की नारियो को इन्साफ दिलाना हैं तो कठोर दंड और ज्यादा निगरानी लाभदायक नहीं होन्गे। बल्कि यह हालातो को और बिगाड़ सकते हैं। पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने कहा था की “कानोन का भय, उसकी निश्चिंतता पर आधारित हैं, उसकी कठोरता पर नहीं”। इन्साफ और बराबरी तभी मिलेगी जब राजनीति देश की जाती और धर्मं नहीं, उसकी समस्याओं के बारे में होगी, जब हिन्दुस्तानी अपने आप में मीडिया की चालबाजी और उसके भ्रष्टाचार को समझने की क्षमता बना पाएंगे, और जब लोग अपने समाज के शोशात्मक और प्रतिबंधक रीती-रिवाजो की खिलाफ खड़े होन्गे।

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